सिटी न्यूज़

यहाँ दलितों की मौत के बाद शव के साथ किया जाता है भेदभाव

UP City News | Feb 20, 2021 07:49 AM IST

भारत का संविधान भले ही देश में सबको समान अधिकार देता हो, या फिर पीएम मोदी खुद सबके साथ, सबके विकास की बात करते हों। मगर देश में आज भी जातीय भेदभाव की कई ऐसी तस्वीरें सामने आती हैं, जो न सिर्फ इंसानियत को शर्मसार करती हैं बल्कि बताती हैं कि आज भी एक भारत में दो भारत बसते हैं। ताजा मामला बुलंदशहर के पहासू से सामने आया, जहां ज़िन्दा लोगों का तो छोड़िए, यहां तो दलितों की मौत के बाद उनके शवों तक से भेदभाव किया जाता है.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक राजेन्द्र सिंह उर्फ रज्जू भैया के पैतृक गांव से जातीय भेदभाव की जो तस्वीर सामने आई है वो न सिर्फ इंसानियत को शर्मसार करती है, बल्कि सवाल खड़ा करती है कि डिजिटल इंडिया के नागरिक की सोच इतनी छोटी कैसे हो सकती है ? यहां शमशान में इस तरह तारबंदी की गई है, जैसे ये दो देशों की सीमा हो। आप भले ही जानकर हैरान हों, मगर जान लीजिये कि सभी को समान अधिकार देने वाले लोकतांत्रिक देश में ये तारबंदी दलितों के शवों के लिए, उनकी अर्थी के लिए और उसके साथ आने वाले लोगों के लिए की गई है। यानि शमशान में तारबंदी के एक तरफ अगड़ी जाति के लोगों के शव जलाए जाते हैं और तारबंदी के दूसरी तरफ उन दलितों के शव, जिनके लिए शमशान में भी दीवार खड़ी कर दी गई है। पीएम मोदी भले ही सबके साथ और सबके विकास की बात करते हों, हम चांद पर चले गए हों, देश विश्वगुरु बन चुका हो, या फिर इंडिया डिजिटल हो चला हो। मगर यहां इंसानों की तो बात ही छोड़िए मुर्दों तक से भेदभाव किया जाता है। यानी बनैल गांव में बने इस शमशान में मुर्दे की जाति देखकर उसका अंतिम संस्कार किया जाता है। सवाल ये कि जब संविधान समान अधिकार देता है, कानून समान अधिकार देता है, तो फिर समाज के ये कतिथ ठेकेदार कौन होते हैं? कौन होते हैं ये जो जीते जी इंसान से उसकी धर्म, उसकी जाति को लेकर भेदभाव करते हैं और मरने के बाद उसकी लाश से। ग्रामीण मानते हैं कि जातीय भेदभाव चलते इस तरह तारबंदी किया जाना ग़लत है, मगर जब यहां तारबंदी की गई होगी उस वक्त किसी की ओर से इसका मुखर होकर विरोध नहीं किया गया होगा, क्योंकि अगर किया गया होता, तो बुलंदशहर के इस गांव से शायद ऐसी तस्वीर सामने नहीं आती.