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जब मैं हाईस्कूल पास हुआ तो खुशी का ठिकाना नहीं रहा

जब मैं हाईस्कूल पास हुआ तो खुशी का ठिकाना नहीं रहा
UP City News | Feb 23, 2021 08:45 AM IST

मेरा नाम रवि है. मैं भदोही का रहने वाला हूं. बात वर्ष 2005 की है. जब में हाईस्कूल में था. उस वक्त स्मार्ट फोन नहीं था. न ही घर पर कोई कंप्यूटर था. उस हाईस्कूल का रिजल्ट आने वाला था. मुझे रिजल्ट देखना था तो मेरी बुआ के बेटे ने अपने इलाक में एक साइबर कैफे पर आने के लिए कहा. उन्होंने कहा कि मेरा जुगाड़ है यहां आ जाओ सबसे पहले तुम्हारा रिजल्ट देखकर बता देगा कैफे वाला. मैं भी उत्सुकता में घर से पांच किलोमीटर दूर गर्मी होने के बावजूद साइकिल से पहुंच गया.

जब मैंने रिजल्ट देखा तो अच्छे नंबर से पास हो गया. अब बात थी घर वालों को बताने की लेकिन कैसे ये सवाल भी था ?, क्योंकि तब फोन नहीं था मेरे घर पर. लिहाजा मैं साइकिल को तेज भगाता हुआ अपने घर की ओर बढ़ने लगा. रोड अच्छी नहीं थी इस वजह से साइकिल बार—बार गड्ढे में कूद रही थी. जिससे मुझे तक्लीफ भी हो रही थी लेकिन पास होने की खुशी में मुझे किसी बात का अहसास नहीं था. खैर मैं अपने घर पहुंचा और परिवार के लोगों को इस बारे में बताया तो सभी बहुत खुश हुए और मुझे मुबारकबाद दी. इसी तरह से आस—पड़ोस और रिश्तेदारों के यहां से भी शुभकामनाएं आईं.

मैं और मेरे घर वाले इस वजह से भी बहुत ज्यादा खुश थे कि सेल्फ सेंटर न होने के बावजूद मैं अच्छे नंबरों से पास हुआ था. मेरे कॉलेज ब्लैक लिस्टेड होने के चलते सेंटर दूसरे कॉलेज में गया था. वो कॉलेज पूरे शहर में सख्त प्रशासन के लिए मशहूर था, यानि नकल की बात तो करिए ही नहीं. खैर मैंने की भी नहीं थी क्योंकि मुझे खुद पर ये यकीन था कि इतना तो मैं पढ़ ही चुका हूं कि पास हो ही जाउंगा. मैं फस्र्ट और सेकंड के चक्कर में नहीं था. खैर इस वक्त मैं एक अच्छे संस्थान में नौकरी करता हूं और कहीं भी मेरी डिग्री सिर्फ इस वजह से देखी जाती है कि मैं वाकई पढ़ा—लिखा हूं या नहीं बाकी तो मेरा अनुभव ही मेरे काम आता है.

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