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मेरी कहानी- उस वाकिए ने मुझे बहुत बड़ा सबक सिखाया, मदद करो लेकिन इसके लिए तैयार रहो

मेरी कहानी- उस वाकिए ने मुझे बहुत बड़ा सबक सिखाया, मदद करो लेकिन इसके लिए तैयार रहो
UP City News | Nov 24, 2021 03:15 PM IST

नई दिल्ली. कई बार दूसरों की मदद करने जाओ और मुसीबत खुद के सिर आ जाती है. ऐसा ही एक वाकिया मेरे साथ भी हुआ. बात तब की है जब में जर्नलिस्म (Journalism) की पढ़ाई कर रही थी. मैं सेकंड ईयर में थी. परीक्षा चल रही थी और सेंटर घर से दूर था तो कई घंटो के सफर के बाद सेंटर तक पहुंचते थे. उस दौरान मेरे तबियत भी ठीक नहीं थी तो मैं परीक्षा देने से पहले में घर के पास के डॉक्टर के पास जा रही थी तभी रस्ते में ट्रैक्टर ने बाइक पर सवार व्यक्ति को टक्कर मा दी और मौके से भाग निकला. बाइक सवार व्यक्ति सड़क पर गिर कर लहूलुहान हो गया. मैं उस समय बैटरी रिक्शा पर सवार पास से गुजरते हुए देखा व्यक्ति सड़क पर पड़ा था लोग उसको घेर कर खड़े थे.

मैंने व्यक्ति की हालत देखकर बिना सोचे समझे कुछ लोगों की मदद से उसी रिक्शा में बैठाया जिसपर मैं सवार थी और पास की सरकारी अस्पताल में उनको लेजाकर इमरजेंसी में भर्ती करवाया और रास्ते में पुलिस को सूचना दी. घटनास्थल से अस्पताल लगभग 10 मिनट की दूरी पर था लेकिन इस दौरान पुलिस वालों की तरफ से मुझे 10-15 कॉल आई और किसी को घायल का हालत की नहीं मेरी डिटेल्स लेने में दिलचस्पी थीऋ मैं कहां रहती हूँ, क्या करती हूँ, मेरा नाम क्या है, मैं उस व्यक्ति की क्या लगती हूं, आदि और यही सारी बात में उस सभी 10-15 कॉल पर रिपीट कर चुकी थी. करीबन आधे घंटे बाद जब मैंने घायल को अस्पताल में भर्ती करवा कर अपने एग्जाम सेंटर की तरफ निकल ही रही थी कि पुलिस की तरफ से एक कॉल आती है और पूछती है की "मैडम में घटनास्थल पर हूं पर यहां तो मुझे कोई नज़र नहीं आ रहा."

उस दिन और उस समय एहसास हुआ की क्या मैंने मदद करके सही किया और ऐसा सिर्फ उस समय नहीं आगे के कई दिन तक एहसास होता रहा. मैंने तो मदद इसलिए कि क्योंकि वो भी शायद किसी के पिता, पति होंगे और किसी की जान बचाना गलत नहीं है. न ही किसी भी कानून और धर्म के हिसाब से जान बचाना गलत है. पुलिस की कॉल का अंत नहीं हुआ और यह सब में मैं एग्जाम सेंटर तक पहुंची पर 1 घंटे लेट होने की वजह से मुझे एग्जाम हॉल में बैठने नहीं दिया गया. वहां तक तो सही था पर कॉल का सिलसिला अभी भी खत्म नहीं हुआ. पुलिस के नाम पर फेक कॉल आनी शुरू हुई. मैंने हताशा की वजह से घायल व्यक्ति की हालत पूछने तक नहीं गयी. कोरोना की वजह से 2 साल निकल गए तीसरा साल अभी चल रहा है लेकिन वो परीक्षा अभी तक नहीं हुई जिससे में देकर अपनी जर्नलिस्म की मार्कशीट ले सकूं और करियर को आगे बढ़ा सकूं.

फेक कॉल का सिलसिला जारी था और मेरे फ़ोन में नंबर ब्लैकलिस्ट का नंबर बढ़ता जा रहा था. उन कॉल में कई अजीब बातें कही जाती थी जो एक लड़की के लिए सही नहीं होती. तकरीबन महीने बाद मुझे घायल व्यक्ति की कॉल आई और उन्होंने मुझे बताया की उनका सिर फटने की वजह से उनके 15 टाके लगे लेकिन हालत ठीक है. तो उन्होने और उनके परिवार ने मुझे धन्यवाद किया. जो मैं कभी नहीं भूल सकती. बेशक मेरे साथ गलत हुआ में परेशान हुई पर मेरी वजह से एक घर का दिया बुझने से बच गया और वो अंकल अब हेलमेट फेन कर बाइक चलते है.

इस सब से मैंने यह सीख लिया किसी की मदद तो जरूर करो पर आगे के परिणाम के लिए अपने आपको दिल और दिमाग को पहले से ही तैयार कर लो. दुनिया में अच्छे लोगों के साथ बुरे लोग भी हैं. तो हमें बुरे लोगों को ध्यान न देकर अच्छे लोगों पर ध्यान देना चाहिए