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Jhansi news: अभी तक बनी है टेसू और झेंझीं के विवाह की परंपरा बुदेलखंड की पहचान

Jhansi news: अभी तक बनी है टेसू और झेंझीं के विवाह की परंपरा बुदेलखंड की पहचान
UP City News | Oct 15, 2021 10:23 AM IST

झांसी. लोक कलाओं के मामले में बुंदेलखंड (Jhansi) अत्यंत समृद्ध है. इस क्षेत्र में त्योहारों का खास महत्व है जो कि नवरात्रि से नजर आने लगता है. वहीं बुंदेलखंड के सुआटा और टेसू लोकोत्सव पूरे 9 दिन उत्साह के साथ मनाए जाते हैं. अभी तक किसी को भी ये मालूम नहीं है कि टेसू और झेंझीं के विवाह की परंपरा कब से शुरू हुई. पर यह अनोखी और अद्भुत है. और बुंदेलखंड को अलग पहचान दिलाती है, जो बृजभूमि और राजस्थान के कुछ इलाकों में भी उसी उत्साह से होती है जैसे बुंदेलखंड में.
इतिहास पर नजर डालें तो पता चलता है कि यह परंपरा महाभारत के बाद प्रारम्भ हुई होगी. क्योंकि यह लोकजीवन में प्रेम कहानी के रूप में प्रचारित हुई थी इसलिए यह इस समाज की सरलता और महानता प्रदर्शित करती है.

एक ऐसी प्रेम कहानी जो युद्ध के दुखद पृष्ठभूमि में परवान चढ़ने से पहले ही मिटा दी गई. यह महा पराक्रमी भीम के पौत्र और घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक की कहानी है जो टेसू के रूप में मनाई जाती है. नाक, कान व मुंह कौड़ी के बनाए जाते हैं जिन्हें लड़कियां रोज सुबह पानी से उसे जगाने का प्रयास करती हैं. विवाह के बाद टेसू का सिर उखाड़ने के बाद लोग इन कौड़ियों को अपने पास रख लेते हैं. कहते हैं कि इन सिद्ध कौड़ियों से मन की मुरादें पूरी हो जाती हैं.

विजयादशमी के दिन से शुरू होकर यह शादी का उत्सव यद्यपि केवल पांच दिन ही चलता है और कार्तिक पूर्णिमा को शादी सम्पन्न हो जाने के साथ ही समाप्त हो जाता है किंतु बच्चे इसकी तैयारी पूरी साल करते हैं. कानपुर से लेकर झांसी तक और कानपुर से उरई होते हुए इटावा तक और बृजभूमि से राजस्थान के कुछ गांवों में होती हुई मुरैना में यह प्रथा घुसती है और भिण्ड होते हुए दोनों ओर से बुंदेली धरती पर परंपरागत रूप से टेसू गीत गूंजने लगता थे. अपने कटे सिर से महाभारत को देखने वाले बर्बरीक की अधूरी प्रेम कहानी को पूरा कराकर भविष्य के नव जोड़ों के लिए राह प्रशस्त करने की ब्रज क्षेत्र में प्रचलित टेसू झांझी की परंपरा को मध्य उत्तर प्रदेश और बुंदेलखंड की धरती सहेज रही है. कहीं बाकायदा कार्ड छपवाकर लोगों को नेह निमंत्रण दिया जाता है तो कहीं बैंड बाजा के साथ बारात पहुंचती है और टेसू का द्वारचार के साथ स्वागत किया जाता है. कहीं झांझी, कहीं झेंझी तो कहीं झिंझिया या झूंझिया, अलग-अलग नाम से जानी जाने वाली इस परंपरा का भाव समान है. टेसू-झांझी के विवाह के बाद ही इस क्षेत्र में शहनाई बजने की शुरुआत होती है.

ऐसे होता है विवाह

टेसू-झेंझी नामक यह खेल बच्चों द्वारा नवमी से पूर्णमासी तक खेला जाता है. इससे पहले 16 दिन तक बालिकाएं गोबर से चांद-तरैयां व सांझी माता बनाकर सांझी खेलती हैं. वहीं नवमी को सुअटा की प्रतिमा बनाकर टेसू-झेंझी के विवाह की तैयारियों में लग जाती हैं. पूर्णमासी की रात को टेसू-झेंझी का विवाह पूरे उत्साह के साथ बच्चों द्वारा किया जाता है. वहीं मोहल्ले की महिलाएं व बड़े-बुजुर्ग भी इस उत्सव में भाग लेते थे. प्रेम के प्रतीक इस विवाह में प्रेमी जोड़े के विरह को बड़ी ही खूबसूरती से दिखाया जाता है.