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What is PFI: पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया क्या है, जानिए क्यों हो रही है उस पर छापेमारी

What is PFI: पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया क्या है, जानिए क्यों हो रही है उस पर छापेमारी
UP City News | Sep 23, 2022 09:42 AM IST

अक्सर विवादों में रहने वाला संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया यानी पीएफआई (Popular Front of India) यकायक फिर चर्चा में आ गया. गुरुवार को कर्नाटक (Karnatak), केरल (Kerala)) समेत 15 राज्यों में पीएफआई (PFI) के ठिकानों पर एनआईए (NIA) द्वारा छापेमारी की गई और 106 पीएफआई सदस्यों को गिरफ्तार कर लिया गया. इसके अलावा दिल्ली और यूपी के कुछ इलाकों में भी इसे लेकर छापेमारी की गई. पीएफआई ने इस कार्रवाई की निंदा की है. पीएफआई इतना बड़ा संगठन बना कैसे और कहां यह प्रभावी है. पढ़ें पूरी जानकारी.

पीएफआई संगठन बना कैसे

पीएफआई का निर्माण सन् 2007 में दक्षिण के 3 मुस्लिम संगठनों के एक साथ आने के बाद हुआ. ये तीन संगठन हैं नेश्नल डेमोक्रेटिक फ्रंट इन केरल (National Democratic Front in Kerala), द कर्नाटक फोरम ऑफ डिगनीटी (Karnataka Forum for Dignity) और तमिलनाडु का मनिथा नेथी पसाराई (Manitha Neethi Pasarai). केरल के कोझीकोड़ में नवंबर सन् 2006 में हुई एक मीटिंग में यह फैसला लिया गया. 16 फरवरी 2007 को बैगरुलू में हुई एंपावर इंडिया कॉन्फ्रेंस नाम की एक रैली में पीएफआई के निर्माण की औपचारिक तौर पर घोषणा की गई.

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कैसे हुआ विस्तार
पीएफआई स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया यानी (Students Islamic Movement of India) सिमी (SIMI) पर प्रतिबिंध लगने के बाद अस्तित्व में आई. पीएफआई ने खुद को अल्पसंख्यक, दलित और कमजोर वर्ग के अधिकारों के लिए लड़ने वाला संगठन बताया. ऐसा दावा किया जाता है कि इसने बीजेपी, कांग्रेस और जेडीएस की जन विरोधी नीतियों का लगातार विरोध किया. मुस्लिमों को समर्थन पाने को लेकर कर्नाटक की ये तीनों ही पार्टियों एक दूसरे पर इससे साठगांठ करने के आरोप लगाती रही हैं. पीएफआई ने कभी चुनाव नहीं लड़ा. वह संघ (RSS), हिंदू जागरण मंच (Hindu Jagran Manch), वीएचपी (VHP) की तर्ज पर ही मुस्लिम समाज में धार्मिक और इस्लामिक कामों को अंजाम देती रही है. दक्षिण पंथी समूहों की तरह ही पीएफआई अपने कार्यकर्ताओं का लेखा जोखा नहीं रखता इसलिए प्रशासन के लिए उन पर कोई एक्शन लेना मुश्किल हो जाता है.

केरल में जमाई जड़ें
2009 में पीएफआई से ही एसडीपीआई नाम का एक ग्रुप निकला जिसका मकसद मुस्लिम, वंचित वर्ग के मुद्दे राजनीतिक मंच पर उठाना था. पीएफआई ने एसजीपीआई को कार्यकर्ता मुहैया कराए जो जमीन पर उनके लिए राजनीतिक गतिविधियों को अंजाम दे सकें. केरल में पीएफआई ने सबसे ज्यादा मौजूदगी नजर आती है जहां उन पर लगातार हत्याएं करने, दंगे करवाने, सांप्रदायिक तनाव भड़काने और आतंकवादियों से संबंध रखने के आरोप लगते रहे हैं. केरल में 2012 में उमान चांडी की अगुआई वाली कांग्रेस सरकार ने हाई कोर्ट में पीएफआई के बारे में बकायदा एक एफिडेविट देते हुए कहा था कि यह प्रतिबंत संगठन स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया यानी सिमी का ही नए रूप में उभार है. केरल सरकार के एफिडेविट के मुताबिक पीएफआई 27 हत्याओं में शामिल रही है जिसमें अधिकतर सीपएम और आरएसएस के लोग थे. इनका मकसद सांप्रदायिक है.

27 लोगों की हत्या का आरोप
दो साल बाद केरल सरकार ने हाई कोर्ट में एक और एफिडेविट दिया जिसमें उसने कहा कि पीएफआई समाज में इस्लाम की भलाई की बात कर धर्मांतरण और सांप्रदायिकता को बढ़ावा दे रही है. वह ऐसे मुस्लिम युवाओं को भर्ती कर उन लोगों को निशाना बनाने का काम करती है जिन पर उसके मुताबिक इस्लाम के खिलाफ काम करने का आरोप है. 2014 का यह एफिडेविट दरअसल पीएफआई के मुखपत्र थेजास के मार्च 2013 से सरकारी विज्ञापन न दिए जाने के बाद कोर्ट में दाखिल की गई याचिका के जवाब में दिया गया था. इस एफिडेविट में पीएफआई कार्यकर्ताओं पर 27 लोगों की हत्या करने, 86 की हत्या का प्रयास करने और 106 साप्रदायिकता बढ़ाने के आरोप लगने की बात कही गई थी.

संघ बनाम पीएफआई
कुछ वक्त पहले केरल बीजेपी के प्रमुख के सुरेंदरन ने आरोप लगाया था कि बीते आरएसएस और बीजेपी के 24 कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी गई जिसमें से 7 हत्याओं का आरोप पीएफआई के लोगों पर है. केरल में हो रही हत्याओं के लिए पीएफआई और बीजेपी एक दूसरे पर लगातार आरोप लगाते रहे हैं. 15 अप्रैल को पलक्कड़ जिले में पीएफआई के एक कार्यकर्ता ए सुबैर को मस्जिद के बाहर मार डाला गया. बीजेपी जिला यूनिट ने इस आरोप से इंकार किया लेकिन पुलिस ने माना कि घटना स्थल पर सुबैर के हत्यारे जो वाहन छोड़कर भागे थे वह संघ कार्यकर्ता ए संजीथ के नाम से रजिस्टर्ड था जिसकी नवंबर में कथिर तौर पर पीएफआई और एडीपीआई के कार्यकर्ताओं ने हत्या कर दी थी. सुबैर की हत्या के एक दिन बाद पलक्कड़ जिले में ही बीजेपी की पकड़ वाले इलाके में पांच लोगों ने मिलकर संघ कार्यकर्ता एस के श्रीनिवासन की हत्या कर दी. प्रशासन ने आगे कोई घटना न हो इसके लिए वहां पुलिस की मौजूदगी काफी बढ़ा दी.

कर्नाटक में मौजूदगी
पीएफआई और एसडीपीआई की मौजूदगी खासतौर पर भारी मुस्लिम आबादी वाले इलाकों में ही रही है. इसमें दक्षिण कर्नाटक का तटीय इलाका, उदुपी है जहां वे स्थानीय चुनाव में वे गांव, कस्बों और शहरों की कई सीटें जीतने में कामयाब रहे हैं. बाद में उन्होंने विधायकों और सांसदों के चुनाव भी लड़ना शुर कर दिए जिसमें उन्हें जीत तो नहीं मिली लेकिन वोट काफी मिला.

पीएफआई ने समय के साथ उत्तर भारत में भी अपनी जड़ें जमा ली हैं. गुरुवार को हुई कार्रवाई में इसके कुछ कार्यकर्ता उत्तर भारत से भी गिरफ्तार किए गए हैं. हालांकि पीएफआई ने हमेशा खुद पर लगे इन आरोपों को खारिज किया और बीजेपी और संघ पर उसे बदनाम करने की साजिश करने का आरोप लगाती रही है. यह संगठन दक्षिण भारत में काफी मजबूत माना जाता है और छापे की कार्रवाई के विरोध में एक दिन की हड़ताल का आह्वान किया है.