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बड़ों से किनारा, छोटे दलों का सहारा, 2022 में जीत का 'अखिलेश फॉर्मूला', क्या है बीजेपी की रणनीति

बड़ों से किनारा, छोटे दलों का सहारा, 2022 में जीत का 'अखिलेश फॉर्मूला', क्या है बीजेपी की रणनीति
UP City News | Nov 24, 2021 01:44 PM IST

दीपक गंभीर
लखनऊ. यूपी के दंगल के लिए दिग्गज़ अभी से ताल ठोकने में लग गए हैं. यूपी में 2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव (UP Elections 2022) के लिए जहां तमाम राजनीतिक पार्टियों (Political Party) ने अपनी रणनीति तैयार शुरू कर दी है. वहीं मुकाबले में बीजेपी (BJP) और सपा (SP) दोनों पार्टियां अपने पाले में तमाम छोटे दलों को लाने में जुटी हुई है. इन छोटे दलों के सहारे ही अपनी नैया को पार लगाने में इन दिनों समाजवादी पार्टी हर फॉर्मूले पर काम कर रही हैं. यूपी के पूर्व सीएम और समाजवादी पार्टी के अध्य्क्ष अखिलेश यादव सियासी ताल ठोकने में लगे हुए हैं. माना जा रहा है कि ये छोटे दल उत्तर प्रदेश की सियासत में अहमियत ज़रूर रखते हैं. विकास के मुद्दे को हर कोई भुनाने में लगा हुआ है.

उत्तर प्रदेश में सियासी संग्राम को लेकर हलचल दिखाई पड़ने लगी है. दलों में आपसी सियासी जोड़-तोड़ का जोर दिखाई देने लगा है. इसी बीच सपा मुखिया अखिलेश यादव की बातें रोज़ ध्यान खींचती है. अभी हाल ही में उन्होंने छोटे दलों पर भरोसा जताया है. हालांकि बात की जाए तो मुस्लिम-यादव समीकरण के जरिए सपा कई बार सत्ता के सिंहासन तक पहुंचती रही है. इन दोनों के वोटबैंक के जरीए ही सपा अपनी कामयाबी का बखान भी करती रही है. यही समाजवादी पार्टी की ताकत रही है. यूपी में समाजवादी पार्टी को मुसलमानों को पहली पसंद माना जाता है.

अखिलेश यादव मानते हैं कि छोटे दलों पर भरोसा कर और उनसे गठबंधन कर उनके लिए बड़ी जीत साबित हो सकती है. सपा मुखिया अपने फॉर्मूले से 350 सीट से ज्यादा जीतने का दावा कर रहे हैं. अखिलेश यादव सियासी समीकरण और राजनीतिक गठजोड़ बनाने में जुटे हुए हैं. सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने ओम प्रकाश राजभर की सुभासपा सहित कई छोटी पार्टियों के साथ हाथ मिलाया है. 23 नवंबर को आरएलडी और सपा के गठबंधन की बात पक्की हो गई है. सीटों के बंटवारे पर भी मुहर लग गई है.

इस बार एक चीज़ जो अलग दिख रही है वो ये है कि समाजवादी पार्टी चीफ अखिलेश यादव 2022 के विधानसभा चुनावों में अपने परंपरागत मुस्लिम-यादव समीकरण के सहारे नहीं रहेंगे. इसके लिए चुनाव से ठीक पहले उन्होंने अपनी रणनीति बदल ली है. तमाम दल दलित वोटों के लिए जोर-आजमाइश करते रहे हैं. अब अखिलेश यादव भी दलित वोटों की इस दौड़ में शामिल हो गए हैं और दलित वोटरों को लुभाने के लिए पूरी कोशिश कर रहे हैं.

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वहीं सबसे ज्यादा दिक्कत बीएसपी और कांग्रेस के लिए नज़र आ रही है क्योंकि कॉंग्रेस और बीएसपी दोनों से ही छोटे दलों के भाव नहीं मिल रहे है. दलों ने दोनों ही पार्टियों से किनारा कर लिया है और अब यूपी में दोनों ही पार्टियों को पूर्ण रूप से किसी का भी सहारा नहीं मिल रहा है.

बीजेपी ने भी इस सियासी संग्राम में कोई कसर नहीं छोड़ी है. कई ऐसे एजेंडे है जिसपर शायद बीजेपी अपना काम कर रही है और 2022 में एक बार फिर सत्ता पर काबिज़ होना चाहती है, लेकिन अखिलेश यादव का मानना है कि जैसे 2017 में कॉंग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था उससे बहुत ज्यादा फायदा नहीं बल्कि नुकसान ही हुआ है. इसलिए कांग्रेस से किनारा, छोटे दलों का सहारा के फॉर्मूले पर अखिलेश अपने हर एजेंडे पर खरा उतरने में लगे हुए हैं. फिलहाल देखना ये है कि 2022 में जीत का अखिलेश 'फॉर्मूला' क्या रिएक्शन दिखाता है. भले ही मौसमी पारे ने अभी से देश में ठंड की दस्तक दे दी हो लेकिन यूपी के सियासी पारे ने भी अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया है. उम्मीद है कि 2022 में जहाँ साईकल चमकने में लगी हुई है तो वहीं कमल ने भी दुबारा खिलने के लिए यूपी में सत्ता के रण में अपनी सियासी मोहरें बिछाना शुरू कर दिया है.