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हरिशंकर तिवारी के बारे में कहा जाता है आप उन्हें पसंद कर सकते हैं, नफरत कर सकते हैं लेकिन नजरअंदाज नहीं

हरिशंकर तिवारी के बारे में कहा जाता है आप उन्हें पसंद कर सकते हैं, नफरत कर सकते हैं लेकिन नजरअंदाज नहीं
UP City News | Sep 15, 2021 08:48 AM IST

पल्‍लवी पाठक

लखनऊ/गोरखपुर. 22 साल से एक ही सीट से विधानसभा पहुंचने वाले और कई बार काबीना मंत्री रहने वाले हरिशंकर तिवारी का पूर्वांचल की राजनीति में बहुत प्रभाव है. उनका प्रभाव विगत दिनों मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के आदेश के बाद उनके आवास तिवारी हाता पर पुलिस की कार्रवाई के बाद सड़कों पर निकले हुजूम से ही लगाया जा सकता है. 84 वर्षीय हरिशंकर तिवारी की एक आवाज पर आधा शहर सड़कों पर था और बम—बम शंकर... जय—जय हरिशंकर के नारों से गोरखपुर गूंज रहा था. ब्राह्मण और ठाकुरों के वर्चस्व की जंग ने सदैव पूर्वांचल की राजनीति को प्रभावित किया है और पूर्वांचल की राजनीति में हरिशंकर तिवारी सबसे बड़े ब्राह्मण नेता हैं. राजनीति में माफियाराज को स्थापित करने के लिए भी हरिशंकर तिवारी को जाता है. 1985 में जेल के भीतर से चुनाव लड़ने वाले हरिशंकर तिवारी 2007 तक अजेय बने रहे. हालांकि 2007 और 2012 के चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा और इसके बाद उन्होंने चुनाव से तौबा कर ली लेकिन आज भी उनकी हनक लोगों की जुबानी और चुनाव में सुनी जा सकती है.

सरकार की कार्रवाई से तंग आकर राजनीति में आए
1980 के दशक में हरिशंकर तिवारी के खिलाफ गोरखपुर में 26 मामले दर्ज किए गए. इन मामलों में हत्या करवाना, हत्या की कोशिश, किडनैपिंग, छिनैती, रंगदारी, वसूली, सरकारी काम में बाधा डालने के मामले थे. हालांकि उन पर आज तक कोई आरोप साबित नहीं हुआ. एक इंटरव्यू में भी उन्होंने कहा कि प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह ने उन पर फर्जी मुकदमे दर्ज कराए थे और इसी से तंग आकर उन्होंने 1985 में चिल्लापूर सीट से जेल से ही चुनाव लड़ा और जीत हासिल की. इसके बाद पूर्वांचल में उनका प्रभुत्व बढ़ता गया. 1980 के दशकों में गोरखपुर में उठने वाले सरकारी ठेके हरिशंकर तिवारी और उनके लोगों को ही मिलते थे. इसके बाद पूर्वांचल की राजनीति ब्राह्मणों और ठाकुरों के वर्चस्व की जंग बन गई. बता दें कि गोरखपुर में राजपूतों के नेता माने जाने वाले वीरेंद्र शाही की हत्या भी हरिशंकर तिवारी के खास मानें जाने वाले श्रीप्रकाश शुक्ला ने की थी. हालांकि बाद में श्रीप्रकाश शुक्ला और हरिशंकर तिवारी के बीच मनमुटाव हो गया था.

क्षेत्र में आज भी है प्रभाव, बेटा है बसपा से विधायक
साल 2012 में हार के बाद से हरिशंकर तिवारी ने चुनाव नहीं लड़ा. उनकी उम्र भी 84 वर्ष हो चुकी है. ऐसे में स्वास्थ्य का हवाला देते हुए उन्होंने खुद को सक्रिय राजनीति से दूर कर लिया. हालांकि हरिशंकर तिवारी उर्फ बाबूजी का आज भी चिल्लूपार में प्रभाव है. वह अपने क्षेत्र के लोगों की शादी ब्याह में दिख जाते हैं. साल 2017 से बसपा के टिकट पर उनके बेटे विनय शंकर तिवारी चिल्लूपार सीट से विधायक हैं. हरिशंकर तिवारी के लिए कहा जाता है कि यूपी और पूर्वांचल की राजनीति में आप उन्हें पसंद कर सकते हैं अथवा उनसे नफरत कर सकते हैं लेकिन उन्हें नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं. बता दें कि हरिशंकर तिवारी फिलहाल अपने गोरखपुर के जटाशंकर मुहल्ले में किलेनुमे घर में रहते हैं. इस घर को तिवारी हाता के नाम से पूरे गोरखपुर और पूर्वांचल में जाना जाता है.