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छोटे दल बड़ा बल: आखिर क्यों यूपी में बड़ी पार्टियों की जरूरत बन चुके हैं छोटे दल, पढ़ें खास रिपोर्ट

छोटे दल बड़ा बल: आखिर क्यों यूपी में बड़ी पार्टियों की जरूरत बन चुके हैं छोटे दल, पढ़ें खास रिपोर्ट
UP City News | Sep 13, 2021 10:26 AM IST

पल्‍लवी

लखनऊ. बदलते दौर में राजनीति का तरीका भी बदल गया है. कभी अपने दम पर चुनाव में उतरने वाली पार्टियां अब छोटे दलों के सहारे चुनावी रण को जीतना चाहतीी हैं. 2017 में भाजपा का प्रयोग सफल होने के बाद आगामी विधानसभा से पूर्व सभी पार्टियां छोटे दलों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश में जुट गई हैं. एक ओर जहां भाजपा अपने पुराने सहयो​गियों को मनाने में जुटी है तो सपा भी नए साथियों का साथ चाहती है. इसके साथ ही भाजपा से नाता तोड़ चुके अति पिछड़ा वर्ग के बड़े नेता ओमप्रकाश राजभर भी अपने साथियों के साथ चुनाव में उतरने की तैयारी में हैं. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि छोटे दलों का अपने क्षेत्र में प्रभाव होता है और बड़े दलों को उनके लिए कुछ ही सीटों को छोड़ना होता है. वहीं बड़े दलों के साथ गठबंधन होने पर एक—दूसरे के हित टकराते हैं. ऐसे में राजनीतिक पार्टियां छोटे दलों को अपने पक्ष में लेने की रणनीति पर काम कर रही हैं.

सपा को मिल चुका है महान दल का साथ, कुनबे में जुड़ सकती है रालो
विधानसभा चुनाव की उल्टी गिनती शुरू होते ही पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अपनी रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया है. सपा महान दल के साथ गठबंधन कर चुकी है तो अखिलेश यादव ने अपने चाचा शिवपाल सिंह यादव के लिए कुछ सीटों को छोड़ने की बात कहकर गठबंधन की बात को हवा दे दी है. इसके साथ ही सपा सुप्रीमो किसान आंदोलन के बाद जाटलैंड में मजबूत हुई रालोद के मुखिया जयंत चौधरी से भी कई दौर की वार्ता कर चुके हैं. संभव है कि चुनाव के नजदीक आते-आते रालोद भी सपा के कुनबे में जुड़ जाए. इसकी एक वजह उपचुनाव में सपा द्वारा रालोद के सामने अपना प्रत्याशी नहीं उतारने के निर्णय को भी माना जा रहा है. वहीं सपा के निशान पर लोकसभा का चुनाव लड़ चुके जनवादी पार्टी के संजय चौहान भी इन दिनों सपा मुखिया के साथ सक्रिय है. ऐसे में उनका साथ भी सपा को मिल सकता है.

उभरते दलित नेता चंद्रशेखर रावण पर कांग्रेस की नजर
पुरानी सियासी जमीन को पाने के लिए इस बार कांग्रेस ने प्रियंका गांधी को यूपी का चुनाव प्रभारी बनाया है. वह भी संगठन को मजबूत करने के लिए दिन-रात एक किए हुए हैं. पार्टी के सूत्रों का कहना है कि कांग्रेस ग्राम पंचायत स्तर पर अपने संगठन का काम कर रहा है. दिसंबर तक काम पूरा होने के बाद पार्टी गठबंधन को लेकर चर्चा करेगी. इधर, प्रदेश में उभरते दलित नेता चंद्रशेखर रावण भी चुनावों में उतरने का संकेत दे चुके हैं. पंचायत चुनाव में उनकी पार्टी आजाद समाज पार्टी कांशीराम का प्रदर्शन बेहतर रहा था. चंद्रशेखर रावण की प्रियंका गांधी से बांडिंग भी काफी अच्छी है. ऐसे में माना जा रहा है कि चुनाव से पहले दोनों पार्टियों में गठबंधन हो सकता है. इसके साथ ही कांग्रेस की नजर अय्यूब अंसारी के दल पीस पार्टी पर भी नजर है.

बसपा को नहीं चाहिए किसी का साथ, छोटे दल आ रहे एक साथ
एआईएमआईएम के विधानसभा चुनाव में एंट्री करने के बाद माना जा रहा था कि बिहार की तर्ज पर बसपा एआईएमआईएम के साथ गठबंधन कर सकती है. हालांकि ध्रुवीकरण की आशंका को लेकर बसपा सुप्रीमो ने गठबंधन करने से इनकार कर दिया है. हालांकि एआईएमआईएम के प्रदेशाध्यक्ष शौकत अली बसपा का साथ चाहते थे लेकिन ऐसा संभव होता नजर नहीं आ रहा है. इधर, भाजपा से अलग हो चुके ओमप्रकाश राजभर अपनी पार्टी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के साथ बाबू सिंह कुशवाहा की जनाधिकार पार्टी, अनिल सिंह चौहान की जनता क्रांति पार्टी, बाबूराम पाल की राष्ट्र उदय पार्टी और प्रेमचंद्र प्रजापति की राष्ट्रीय उपेक्षित समाज पार्टी ने भागीदारी संकल्प मोर्चा के नाम से नया गठबंधन तैयार किया है. यह प्रदेश की पिछड़ी जातियों के नेताओं का नया गठबंधन है. ओमप्रकाश राजभर का कहना है कि जिस समाज का जहां प्रभाव होगा, वहां से गठबंधन का प्रत्याशी उतारा जाएगा.

भाजपा 2017 से ही निभा रही गठबंधन धर्म
2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने ही सबसे पहले छोटे दलों के साथ गठबंधन की शुरुआत की थी और इसका अपेक्षा अनुरूप परिणाम भी भाजपा को मिला था. भाजपा ने उस समय अपना दल (एस) की अनुप्रिया पटेल और ओमप्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के साथ गठबंधन किया था. भाजपा ने अपना दल को 11 को सुभासपा को आठ सीटें देकर खुद 384 सीटों पर चुनाव लड़ा था. चुनाव में भाजपा को 312, सुभासपा को चार और अपना दल को नौ सीटों पर जीत मिली थी. हालांकि भाजपा के पुराने सहयोगी ओमप्रकाश राजभर अब गठबंधन से अलग हो चुके हैं. उन्हें मनाने की भाजपा नेतृत्व ने काफी कोशिश की लेकिन बा​त नहीं बन सकी. इस बार भाजपा निषाद समाज पार्टी को अपना नया साथी बना चुका है. इसके लिए पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा से मुलाकात भी कर चुके हैं.