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यहां पढ़ें क्या है उत्तर प्रदेश में ओबीसी वोट का गणित, कैसे बीजेपी पड़ रही है सब पर भारी

यहां पढ़ें क्या है उत्तर प्रदेश में ओबीसी वोट का गणित, कैसे बीजेपी पड़ रही है सब पर भारी
UP City News | Sep 14, 2021 03:00 PM IST

आदिल मंसूरी

लखनऊ. उत्तर प्रदेश की राजनीति में पिछड़ा वर्ग का बड़ा प्रभाव है. प्रदेश की राजनीति में पिछड़ा वर्ग का वोट बैंक 53 फीसदी है और यही वोट बैंक प्रदेश की राजनीति की दि​शा तय करता आया है. 2017 में इसी वर्ग को साधने का ही नतीजा था कि प्रदेश की सत्ता पर भाजपा आसीन हो सकी. पिछड़ा वर्ग के प्रभाव वाली सीटों में से 125 सीटों पर भाजपा ने कब्जा जमाया था. यही कारण है कि आगामी विधानसभा चुनाव से पूर्व पिछड़ा वर्ग को साधने की कोशिश शुरू हो चुकी है. सभी पार्टियां पिछड़ा वर्ग को साधने की कोशिश में इस वर्ग के नेताओं को अपने पाले में करने की जुगत में है और इसी वोट बैंक को आधार बनाकर सुभासपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर ने भाजपा से बगावत की और अब अपना अलग गठबंधन बनाकर चुनाव में उतरने की तैयारी में है. हालांकि यदि गौर करें तो पिछड़ा वर्ग पर अन्य राजनीतिक दलों की अपेक्षा भाजपा का अधिक प्रभाव है. आइए जानते हैं प्रदेश की राजनीति में पिछड़ा वर्ग का समीकरण और भाजपा पर इसका प्रभाव...

53 फीसदी पिछड़ा वर्ग का वोट बैंक, पूर्वांचल में 18 फीसदी राजभर
प्रदेश में पिछड़े वर्ग की आबादी 53 फीसदी है. इसमें यादव 10 प्रतिशत, कुर्मी, सैथवार आठ प्रतिशत , मल्लाह पांच फीसदी, लोध सात फीसदी, जाट तीन प्रतिशत, विश्वकर्मा दो फीसदी, गुर्जर दो फीसदी, पटेल सात प्रतिशत और अन्य पिछड़ी जातियों की तादाद 9 फीसदी है. यूपी की राजनीति में ओबीसी वोट बैंक की आती है तो यादव को छोड़कर अन्य पिछड़ी जातियां कहीं अलग खड़ी नजर आती हैं. जानकारों की मानें तो यूपी की सभी 80 लोकसभा सीटों पर गैर यादव ओबीसी का वोट पांच लाख से लेकर साढ़े आठ लाख तक है. मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो पूरे प्रदेश में राजभर समाज की आबादी तीन फीसदी है. हालांकि पूर्वांचल में इस समाज की 18 फीसदी आबादी है. यदि गौर करें तो पूर्वांचल में अधिकांश सीटों पर 12 फीसदी से लेकर 22 फीसदी राजभर वोट हैं. गाजीपुर, बलिया, वाराणसी, जौनपुर, मऊ,आजमगढ़, देवरिया और कुशीनगर सहित अन्य जिलों में राजभर समाज ही किंगमेकर है. इस समाज ने जिस प्रत्याशी अथवा पार्टी की ओर झुकाव किया तो उसका जीतना तय है.

पिछड़ा वर्ग में शामिल अन्य जातियां और उनका गणित
गैर यादव ओबीसी वोटबैंक की बात करें, तो दूसरे नंबर पर पटेल और कुर्मी वोट बैंक आता है. यूपी की राजनीति में इस वर्ग का सात फीसदी वोट है. जातिगत आधार पर देखें तो प्रदेश में 16 जिलों में कुर्मी और पटेल वोट बैंक छह से 12 फीसदी तक है. इनमें मिर्जापुर, सोनभद्र, बरेली, उन्नाव, जालौन, फतेहपुर, प्रतापगढ़, कौशांबी, इलाहाबाद, सीतापुर, बहराइच, श्रावस्ती, बलरामपुर, सिद्धार्थनगर और बस्ती हैं. यादव और कुर्मी के अतिरिक्त ओबीसी वोटबैंक में करीब डेढ़ सौ और जातियां हैं, जिन्हें अति पिछड़ों की श्रेणी में रखा जाता है. इसमें ओबीसी की कुशवाहा जाति का 13 जिलों में 10 फीसदी का वोट बैंक है. इन जिलों में फिरोजाबाद, एटा, मैनपुरी, हरदोई, फर्रुखाबाद, इटावा, औरैया, कन्नौज, कानपुर देहात, जालौन, झांसी, ललितपुर और हमीरपुर हैं. ओबीसी में एक और बड़ा वोट बैंक लोध जाति का है. प्रदेश के 23 जिलों में लोध समाज के वोट बैंक का दबदबा है. इनमें रामपुर, ज्योतिबाफुले नगर, बुलंदशहर, अलीगढ़, महामायानगर, आगरा, फिरोजाबाद, मैनपुरी, पीलीभीत, लखीमपुर, उन्नाव, शाहजहांपुर, हरदोई, फर्रुखाबाद, इटावा, औरैया, कन्नौज, कानपुर, जालौन, झांसी, ललितपुर, हमीरपुर, महोबा शामिल हैं, जहां इस समाज का वोट बैंक 10 फीसदी है.

पिछड़ा वर्ग पर भाजपा का प्रभाव
गैर यादव ओबीसी नेताओं की बात करें तो सभी राजनीतिक दलों में कई नेता पिछड़ा वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं. इन नेताओं में बेनी प्रसाद वर्मा, श्रीप्रकाश जायसवाल, केशव प्रसाद मौर्य, स्वामी प्रसाद मौर्य, राम अचल राजभर, लालजी वर्मा, सुखदेव राजभर, आरएस कुशवाहा, नरेश उत्तम, स्वतंत्रदेव सिंह, धर्म सिंह सैनी, ओमप्रकाश राजभर, अनिल राजभर, उमा भारती, विनय कटियार, अनुप्रिया पटेल, कृष्णा पटेल जैसे कद्दावर नेता हैं. पिछड़ा वर्ग के अधिकांश बड़े नेता भाजपा में शामिल है. इसके साथ ही पटेल समाज की प्रमुख नेता अनप्रिया पटेल का भी भाजपा से गठबंधन है. विगत विधानसभा चुनाव में भी पिछड़ा वर्ग ने अपना भाजपा प्रेम प्रदर्शित किया था. इसके साथ ही लोधा समाज के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह भी भाजपा में ही रहे और इस बार उनके निधन के बाद भाजपा उनके नाम पर सहानुभूति हासिल करने की कोशिश करेगी, जो लोधा वोट बैंक वाली सीटों पर प्रभाव डालेगी.