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कबीर दास की पुण्यतिथि के मौके पर आइए जानते हैंं उनके कुछ दोहे के अर्थ

कबीर दास की पुण्यतिथि के मौके पर आइए जानते हैंं उनके कुछ दोहे के अर्थ
UP City News | Feb 22, 2021 10:27 AM IST

कबीर दास (Kabir Das) भारत के महान कवि और समाज सुधारक थे. कबीर दास के नाम का अर्थ महानता से है. वे भारत के महानतम कवियों में से एक थे. जब भी भारत में धर्म, भाषा, संस्कृति की चर्चा होती है तो कबीर दास का नाम का जिक्र सबसे पहले होता है क्योंकि कबीर दास ने अपने दोहों के माध्यम से भारतीय संस्कृति को दर्शाया है. इसके साथ ही उन्होनें जीवन के कई ऐसे उपदेश दिए हैं जिन्हें अपनाकर दर्शवादी बन सकते हैं. इसके साथ ही कबीर दास ने अपने दोहों से समाज में फैली कुरोतियों को दूर करने की कोशिश भी की है और भेदभाव को मिटाया है. कबीर पंथ के लोग को कबीर पंथी कहे जाते है जो पूरे उत्तर और मध्य भारत में फैले हुए हैंं. संत कबीर के लिखे कुछ महान रचनाओं में बीजक, कबीर ग्रंथावली, अनुराग सागर, सखी ग्रंथ आदि है. तो आइए जानते है कबीर दस द्वारा लिखे दोहे के बारे में जो आपको कुछ सीखा देंगे और आपके जीवन में हमेशा काम आएगा.

माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर,
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर

कोई व्यक्ति लम्बे समय तक हाथ में लेकर मोती की माला तो घुमाता है, पर उसके मन का भाव नहीं बदलता, उसके मन की हलचल शांत नहीं होती. कबीर की ऐसे व्यक्ति को सलाह है कि हाथ की इस माला को फेरना छोड़ कर मन के मोतियों को बदलो या फेरो.

अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप,
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप

अर्थ: न तो अधिक बोलना अच्छा है, न ही जरूरत से ज्यादा चुप रहना ही ठीक है. जैसे बहुत अधिक वर्षा भी अच्छी नहीं और बहुत अधिक धूप भी अच्छी नहीं है.

दुर्लभ मानुष जन्म है, देह न बारम्बार,
तरुवर ज्यों पत्ता झड़े, बहुरि न लागे डार.

अर्थ: इस संसार में मनुष्य का जन्म मुश्किल से मिलता है. यह मानव शरीर उसी तरह बार-बार नहीं मिलता जैसे वृक्ष से पत्ता झड़ जाए तो दोबारा डाल पर नहीं लगता.

कबीरा खड़ा बाज़ार में, मांगे सबकी खैर,
ना काहू से दोस्ती,न काहू से बैर.

अर्थ: इस संसार में आकर कबीर अपने जीवन में बस यही चाहते हैं कि सबका भला हो और संसार में यदि किसी से दोस्ती नहीं तो दुश्मनी भी न हो!

जब गुण को गाहक मिले, तब गुण लाख बिकाई.
जब गुण को गाहक नहीं, तब कौड़ी बदले जाई.

अर्थ: कबीर कहते हैं कि जब गुण को परखने वाला गाहक मिल जाता है तो गुण की कीमत होती है. पर जब ऐसा गाहक नहीं मिलता, तब गुण कौड़ी के भाव चला जाता है.