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नजीर अकबराबादी ने जन्माष्टमी पर ऐसी नज्म लिखी, सैकड़ों साल बाद भी लोग कहते हैं- यारो सुनो! यह दधि के लुटैया का बालपन

नजीर अकबराबादी ने जन्माष्टमी पर ऐसी नज्म लिखी, सैकड़ों साल बाद भी लोग कहते हैं- यारो सुनो! यह दधि के लुटैया का बालपन
UP City News | Aug 19, 2022 12:03 PM IST

आगरा. महाकवि नजीर अकबराबादी ने कविताओं में हर उस चीज को शामिल किया, जो सीधे लोगों की जिंदगी से जुड़ी रही हो. बात चाहे मेलों की हो या त्योहारों की. हर बात पर नजीर ने अपनी कविता को लिखकर लोगों का ध्यान आकर्षित किया. आज जन्माष्टमी है तो नजीर ने इस खास त्योहार पर भी अपनी कलम को चलाया. उन्होंने भगवान श्री कृष्ण पर बहुत ही शानदार कविता लिखकर ये साबित कर दिया है नाम तो उनका नजीर था पर मजहब उनकी कविता थी, जिसने श्री कृष्ण पर भी लिखा तो महाकवि नजीर अकबराबादी ने ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती पर भी. उन्होंने दीपावली पर भी लिखा तो ईद को भी अपनी कविताओं में जगह दी. उन्होंने होली के रंगों की तारीफ की तो शब-ए-बरात और मुहर्रम का भी जिक्र अपनी कविताओं में किया. आइए आज हम उनकी भगवान श्री कृष्ण पर लिखी गई कविता को पढ़ते हैं जो बेहद शानदार होने के साथ ही उनके यानी भगवान श्री कृष्ण के बालपन को बेहद खूबसूरत डंग से रेखांकित करती है.

-यारो सुनो, यह दधि के लुटैया का बालपन, और मधुपुरी नगर के बसैया का बालपन.
मोहन सरूप निरत करैया का बालपन. बन-बन के ग्वाल गोएं चरैया का बालपन.
ऐसा था बांसुरी के बजैया का बालपन. क्या-क्या कहूं मैं किशन कन्हैया का बालपन.

-ज़ाहिर में सुत वह नन्द जशोदा के आप थे. वर्ना वह आप माई थे और आप बाप थे.
पर्दे में बालपन के यह उनके मिलाप थे. जोती सरूप कहिये जिन्हें सो वह आप थे.
ऐसा था बांसुरी के बजैया का बालपन. क्या-क्या कहूं मैं किशन कन्हैया का बालपन.

-उनको तो बालपन से न था काम कुछ ज़रा. संसार की जो रीति थी उसको रखा बजा.
मालिक थे वह तो आपी उन्हें बालपन से क्या. वां बालपनए जवानी, बुढ़ापा, सब एक था.
ऐसा था बांसुरी के बजैया का बालपन. क्या-क्या कहूं मैं किशन कन्हैया का बालपन.

-मालिक जो होवे उसको सभी ठाठ या सरे. मालिक जो होवे उसको सभी ठाठ या सरे.
चाहे वह नंगे पांव फिरे या मुकुट धरे. सब रूप हैं उसी के वह जो चाहे सो करे.
चाहे जवां हो, चाहे लड़कपन से मन हरे.
ऐसा था बांसुरी के बजैया का बालपन. क्या-क्या कहूं मैं किशन कन्हैया का बालपन.

-बाले हो व्रज राज जो दुनिया में आ गए. लीला के लाख रंग तमाशे दिखा ग.
इस बालपन के रूप में कितनों को भा गए. इक यह भी लहर थी कि जहां को जता गए.
ऐसा था बांसुरी के बजैया का बालपन. क्या-क्या कहूं मैं किशन कन्हैया का बालपन.

-यूं बालपन तो होता है हर तिफ़्ल का भला. पर उनके बालपन में तो कुछ और भेद था.
इस भेद की भला जीए किसी को ख़बर है क्या. क्या जाने अपने खेलने आये थे क्या कला.
ऐसा था बांसुरी के बजैया का बालपन. क्या-क्या कहूं मैं किशन कन्हैया का बालपन.