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कैसे मिली आजादी, जानिए 109 साल के इमामउद्दीन की जुवानी, अंग्रेज के दिखते ही बेलचे से करते थे कुटाई

कैसे मिली आजादी, जानिए 109 साल के इमामउद्दीन की जुवानी, अंग्रेज के दिखते ही बेलचे से करते थे कुटाई
UP City News | Aug 06, 2022 12:07 PM IST

आगरा. हिंदुस्तान ने अंग्रेजों की गुलामी की दंश झेला. मगर, आजादी से मुहब्बत करने वालों ने इस वतन को आजाद कराने के लिए देश के लाखों लोग शहादत का जाम पीने से भी पीछे नहीं हटे. आजादी की लड़ाई में आगरा कभी पीछे नहीं रहा. यहां के रणबांकुरों ने अंग्रेजों से जमकर मुकाबला किया. इस आजादी के लिए न जाने कितनों की शहादत हुई , मगर, जोश कम न हुआ. जिस तरफ निकल जाते थे गोरों में दहशत तारी कर देते. कई मौके तो ऐसे आए कि अंग्रेज भी आगरा में स्वतंत्रता सेनानियों से डरने लगे थे. चारों ओर इंकलाब जिंदाबाद और हर हाल में मुल्क को आजाद कराकर रहेंगे....जैसे नारे ही गूंजते थे. इस आजादी की कहानी को 109 साल के हो चुके इमामुद्दीन ने एक लाइव शो की तरह से सामने रखा.

109 साल के हो चुके पहलवान इमामुद्दीन कुरैशी से जब आजादी की बात करी तो गला भर आया और आंखों से आंसू आने लगे. उन्होने कहा कि आजादी के लिए एक साथ लड़े थे लेकिन आजाद होने के बाद हम बिखए गए. अगर, आज जैसे हालात होते तो अंग्रेजों की गुलामी से कभी भी न आजाद हो पाते. उन्होंने बताया कि हम और हमारी टोली अंग्रेजों के खिलाफ जंग की रणनीति बनाने के लिए अलग-अलग जगहों का इस्तेमाल करती थी. खाकसार आंदोलन में आगरा-फिरोजाबाद की अगुवाई करने वाले इमामुद्दीन कुरैशी कहते हैं कि अंग्रेजों की एयरफोर्स में मीट सप्लाई का काम करते थे लेकिन जब भारतीयों पर जुल्म हुआ तो देश को आजाद कराने के लिए हमने नौकरी छोड़ दी. खाकसार आंदोलन से जुड़े लोग खाकी पठानी सूट और हाथ में बेलचा लेकर चलते थे, जैसे ही कोई अंग्रेज दिखता था उस पर टीम टूट पड़ती थी. हम छतों पर बैठकर अंग्रेजों के आने का इंतजार करते थे.

पाकिस्तान में नहीं लगा दिल तो वापस आ गए
देश आजाद हुआ तो आगरा से बहुत से रिश्तेदार और हमारी बहन और बहनोई पाकिस्तान चले गए. मैं भी चला गया. मैंने अपनी बेगम से कहा तो उन्होंने मना कर दिया. फिर भी अपने बेटे सिराज कुरैशी को छोड़कर मैं चला गया. तीन साल पाकिस्तान में रहकर चमड़े की रंगाई का काम किया लेकिन हिंदुस्तान हमेशा दिल में रहा. अपने की याद सताने लगी. वो जंग की यादें जो हिंदू-दोस्तों के साथ मिलकर लड़ी. एक दिन अपना सारा पैसा अपनी बहन और अन्य रिश्तेदारों को देकर पानी के जहाज से वापस आगरा आ गया,

आगरा फोर्ट रेलवे स्टेशन पर घेर लेते थे अंग्रेजों को
इमामुद्दीन कुरैशी ने बताया कि जहां पर हम रहते थे वहां से चंद कदम की दूरी पर ही आगरा फोर्ट रेलवे स्टेशन था. इसी स्टेशन पर अंग्रेज बड़ी संख्या में उतरते थे और दूसरे शहरों के लिए रवाना होते थे. इसलिए यहां पर आजादी की लड़ाई लड़ने वालों के लिए हमेशा खतरा रहता था. जैसे ही हमें या अन्य लोगों को पता चलता था कि अंग्रेज आ रहे हैं तो उन पर गुरिल्ला हमला कर देते थे. गोरों पर हमला करके मंटोला, नाई की मंडी, ढोलीखार की छोटी-छोटी गलियों में छुप जाते थे. अंग्रेज तलाशते थे पिनाहट और राजखेड़ा के बीहड और चंबल क्षेत्ऱ में जाकर छुप जाते थे और कई दिनों बाद फिर से आ जाते थे. उन्होंने कहा कि बस हर गली से इंकलाब जिंदा बाद और गोरों को भगाएंगे मुल्क को आजाद कराएंगे और आधी रोटी खाएंगे देश को आजाद कराएंगे आदि तरह के नारे ही सुनाई देते थे.

आज की पीढ़ी को सुनानी होंगी जंग-ए-आजादी की कहानी
पहलवान इमामुद्दीन कुरैशी ने कहा कि आज की पीढ़ी को बताना होगा कि आजादी की जंग का इतिहास शूरवीरों के किस्सों से भरा पड़ा है. इनमें कई ऐसे हैं, जिनकी बहादुरी के चर्चे आज भी होते हैं. उस दौर की निशानिया अभी भी जीवंत हैं, जो आजादी की लड़ाई के गवाह हैं. क्रांतिवीरों की याद दिलाते हैं. गौरवशाली गाथा सुनकर और पढ़कर एक अभिमान की अनुभूति होती है. इतना ही नहीं गर्व से सीना भी फूल जाता है.

आज होता है दुख
इमामुद्दीन कुरैशी कहते हैं कि जिस तरह से देश के हालात हैं उसे देखकर बड़ा दुख होता है. पहले पता ही नहीं होता था कौन हिंदू-कौन मुस्लिम. बस एक ही जुनून था कि मुल्क को कैसे आजाद कराएं. इसी जद्दोजहद में पूरा दिन निकल जाता था. बस एक ही ख्वाहिश हुआ करती थी कि कैसे भी करके अंग्रेजों को देश से भगाया जाए...पर, आज के हालत को देखकर अफसोस ही नहीं बहुत दुख भी होता है. अगर आज जैसे हालात पहले होते तो मुल्क कभी भी आजाद न होता. पता नहीं आज क्या हो गया है कि कभी एक थाली में बैठकर खाना खाने वाले राम-रहीम अब एक दूसरे से बात करना तक पसंद नहीं करते.